UPI पर शुल्क की राह खुली, छोटे व्यापारियों और ग्राहकों को राहत
UPI पर शुल्क की राह खुली, छोटे व्यापारियों और ग्राहकों को राहत
संसद से टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 पारित होने के बाद UPI के भविष्य को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। इस बदलाव के तहत UPI लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की छह साल पुरानी वैधानिक रोक हटा दी गई है। हालांकि सरकार और वित्त मंत्रालय ने साफ किया है कि फिलहाल आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों पर कोई नया शुल्क लागू नहीं किया जा रहा है।
प्रस्तावित ढांचे में ₹1.5 करोड़ से कम टर्नओवर वाले छोटे व्यापारियों को MDR से छूट जारी रखने की बात कही गई है। वहीं भविष्य में ₹2,000 से अधिक के UPI लेन-देन पर बड़े व्यापारियों से 0.25% से 0.5% तक शुल्क लेने की संभावना जताई जा रही है। यह दर क्रेडिट कार्ड के सामान्य शुल्क की तुलना में काफी कम होगी।
UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का अहम आधार बन चुका है। हर महीने अरबों लेन-देन होने के कारण इसके सर्वर, साइबर सुरक्षा, फ्रॉड प्रिवेंशन, कस्टमर सपोर्ट और सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार खर्च बढ़ रहा है। दूसरी ओर, बैंकों और फिनटेक कंपनियों को मिलने वाली सरकारी सहायता में कमी ने UPI के मौजूदा जीरो-फीस मॉडल की वित्तीय स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं।
UPI का असर सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में भी डिजिटल भुगतान ने छोटे दुकानदारों और स्ट्रीट वेंडर्स को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डिजिटल लेन-देन की हिस्ट्री भविष्य में उनकी क्रेडिट हिस्ट्री और ऋण पात्रता में भी मददगार हो सकती है।
ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय स्थिरता और डिजिटल समावेशन के बीच संतुलन बनाने की है। बड़े व्यापारियों से मामूली शुल्क लेकर भुगतान नेटवर्क की लागत को संभालना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन आम ग्राहकों और छोटे दुकानदारों के लिए मुफ्त UPI की सुविधा बनी रहना बेहद जरूरी है।
भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति की सफलता का बड़ा कारण इसकी सरलता और कम लागत रही है। इसलिए आने वाले समय में किसी भी नए शुल्क ढांचे को इस तरह तैयार करना होगा कि UPI आर्थिक रूप से टिकाऊ भी बने और उसकी पहुंच आम लोगों तक पहले की तरह बनी रहे।